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Wednesday, October 14, 2020

दुर्लभ ब्रह्मकमल से लहलहाया हिमालय, कोरोना ने सुधारी आबोहवा तो बारिश अधिक हुई और एक माह बढ़ गई इस फूल की जिंदगी

उत्तराखंड के रूपकुंड का आखिरी बेसकैंप बघुवाशा ब्रह्मकमल के फूलों से लकदक है। करीब 14500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस हिमालयी क्षेत्र में सबसे अधिक दुर्लभ ब्रह्मकमल और नीलकमल खिलते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये फूल जुलाई से सितम्बर तक खिलते हैं लेकिन इस बार कोरोना के कारण आबोहवा बदली। इसके कारण यहां लंबे समय तक बारिश होने से ब्रह्मकमल अक्टूबर में भी खिले हुए हैं।

धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा है ब्रह्मकमल

ब्रह्मकमल यानी 'ब्रह्मा का कमल'। मान्यता है कि भगवान शिव को खुश करने के लिए ब्रह्माजी ने ब्रह्मकमल की रचना की थी। उत्तराखंड में मान्यता है कि शिव मां नंदा देवी के साथ यात्रा कर रहे थे, तब नंदा देवी ने अपना वाहन बाघ यहीं छोड़ा था। इसलिए इस जगह को बघुवाशा भी कहा जाता है।

इस पुष्प की मादक सुगंध का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है जिसने द्रौपदी को इसे पाने के लिए व्याकुल कर दिया था। कहते हैं कि जब भगवान विष्णु हिमालय क्षेत्र में आए तो उन्होंने भोलेनाथ को 1000 ब्रह्मकमल चढ़ाए, जिनमें से एक पुष्प कम हो गया था। तब विष्णु भगवान ने पुष्प के रुप में अपनी एक आंख भोलेनाथ को समर्पित कर दी थी। तभी से भोलेनाथ का एक नाम कमलेश्वर और विष्णु भगवान का नाम कमल नयन पड़ा।

क्यों खास है ब्रह्मकमल

ब्रह्मकमल एस्टेरेसी फैमिली का पौधा है। सूर्यमुखी, गेंदा, डहेलिया, कुसुम और भृंगराज इसी फैमिली के फूल हैं। दुनियाभर में ब्रह्मकमल की कुल 210 प्रजातियां पाई जाती हैं। जिनमें भारत में 61 प्रजातियां मौजूद हैं। उत्तराखंड में ब्रह्म कमल,फैन कमल, कस्तूरबा कमल प्रजाति के फूल बैगनी रंग के होते हैं।

यह मां नन्दा का प्रिय पुष्प है। इसे नन्दाष्टमी के समय में तोड़ा जाता है और इसके तोड़ने के भी सख्त नियम होते हैं जिनका पालन किया जाना अनिवार्य होता है।

दिन में नहीं सूर्यास्त के बाद खिलता है

ब्रह्मकमल दूसरे फूलों की तरह सुबह नहीं खिलता है। यह ऐसा फूल है जिसे खिलने के लिए सूर्य के अस्त होने का इंतजार करना पड़ता है। इसका खिलना देररात शुरू होता है दस से ग्यारह बजे तक यह पूरी तरह से खिल जाता है। भारत मेंं यह हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश और कश्मीर में पाया जाता है। भारत के अलावा ब्रह्मकमल नेपाल, भूटान, म्यांमार और पाकिस्तान में भी पाया जाता है।

27 किमी की यात्रा में 20 किमी खड़ी चढ़ाई
हर 12 साल में नंदा देवी राजजात यात्रा इस मार्ग से निकलती है। अब यह यात्रा 2024 में होनी है। रूपखंड से बघुवाशा पहुंचने में तीन दिन लगते हैं। 27 किमी की यात्रा में 20 किमी की खड़ी चढ़ाई है। ऑक्सीजन की कमी महसूस होती है। सालभर तापमान 0 डिग्री, सर्दियों में माइनस 20 डिग्री तक चला जाता है। यहां कस्तूरी मृग, भालू, हिम तेंदुए भी मिलते हैं।



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विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार यहां लंबे समय तक बारिश होने से ब्रह्मकमल अक्टूबर में भी खिले हुए हैं। तस्वीर के बैकग्राउंड में बर्फ से ढंकी नंदाघूंघटी और त्रिशूल पर्वत हैं। फोटो- विक्रम तिवारी


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